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पन्ना के माथे पर कुपोषण और शिशु मृत्यु का कलंक

पन्ना एनआरसी के एमईएस के अनुसार शिशु मृत्यु में पन्ना एशिया में सबसे आगे है | जिले में वर्तमान में कुल 6 पोषण पुनर्वास केन्द्र हैं | पन्ना जिला अस्पताल,गुनौर,अजयगढ़,पवई ,अमानगंज तथा शाहनगर में पोषण पुनर्वास केन्द्र हैं | इनमें से अमानगंज के पोषण पुनर्वास केंद्र की सुविधाओं की हालत बहुत ही खराब है
यहॉं कुपोषण की स्थिति गंभीर हैं। बेरोजगार के चलते युवा पलायन का हैं और बच्चे कुपोषण का षिकार होकर असमय मर हरे है। महिलाए भी एनीमिया की षिकार हैं । आगनबाडी केंन्द्रों की टेक होेम स्कीम पूरी तरह से फ्लाप हो चुकी है । जिससे आदिवासी बहुल क्षेत्र मे स्थिति और भी गंभीर हो गई है। जिले के आधा दर्जन पोषण पुनर्वोस केन्द्रों की आधी सीटें खाली रहती है। षासन के लाख प्रयास के बाद भी कुपोेषण हटने की बजाए बढता जा रहा हैं। ज्ञात हो कि कालाहांडी उड़ीसा का ऐसा जिला है। जहॉं सबसे अधिक कुपोषित बच्चे पाए जाते है।
स्वास्थ्य विभाग के जारी आकड़ो के अनुसार जिले में मातृ एवं षिषु मृत्युदर बढ़ाने का बडा कारण खून की कमी के कारण सुरक्षित प्रसव के बाद भी अधिकांष बच्चे कुपोषित रह जाते है। ग्रामिण अंचलो और आदिवासी बहुल कल्दा सहित अन्य क्षेत्रों में तो 60 से 70 फीसदी तक बच्चे कुपोषित है।
सरकारी आंकड़ों तक ही सीमित है योजनाए
जिला महिला एवं बाल विकास विभाग के आंकड़ों के अनुसार यहॉं 0 से 5 साल तक के 1 लाख 14 हजार 200 से अधिक बच्चे दर्ज हैे। इनमे से विभाग की ओर से हर माह करीब एक लाख बच्चों का वजन लिया जाता है।। जिनमे 18 से 20 हजार बच्चे कुपोेेेेषित पाए गए। इनमे से करीब डेढ़ हजार बच्चे गंभीर रुप से कुपोषित पाए गए है। विभाग के इन आंकड़ों के अनुसार फिर भी स्थिति उतना गंभीर नहीं दिखता है जबकि हकीकत उसके उलटा ही है जिले के दूरस्थ अंचल सेमरिया ष्यामगिरी सलेहा कल्दा पठार के आदिवासी गांवो में कई जगह तो देखने को मिला कि 80 सेे 90 फीसदी तक बच्चे कुपोषित है।
मैदानी अमला खाना पूर्ती तक है सीतिम
समय -समय पर जिले के पोषण पुरवास केन्दों का दौर करने वाले अधिकारियो और कलेक्टर ने किसी भी हालत मे पोषण पुनर्वास केन्द्रों के बेड़ खाली नहीं रहनेे के निर्देष दिए थे पर निर्देषों का मल नहीं हो पा रहा है। दो वक्त की रोटी के लिए दिनभर मजदूरी करने वाले अधिकांष आदिवासियों और गरीब वर्ग के लोगो को तो पता भी नहीं होता है। कि उनके बच्चे कुपोषित हैं। कई आंगड़बाड़ी केन्दों में तो बच्चों के वजन लेने की मषीनें वर्षो से खराब है। ऐसे हालत मे बच्चों के सही वजन मिल पाने कोे लेकर भी सेसय बना रहा हैं।
कुपोषण सीधा आक्सीजन से जुड़ा है। लोगो के पास रोजगार नहीं है। खने के लिए भोजन नहीं है। जिले में रोजगार संसाधन नहीं होने के कारण कुपोषण गंभीर स्तर पर हैं। 40 फीसदी से अधिक बच्चे कुपोसण के षिकार हैं! अधिकांष कुपोषित बच्चों में टी वी की बीमारी भी पाई गई हैं! एनजीओ द्वारा दो बच्चे को बचाया भी गया है। स्वास्थ्य विभाग का अमला भी इस दिषा में ध्यान नहीं दे रहा है।
कुपोषण के साथ तोहफे में टीवी भी
अधिकांष कुपोतिष बच्चे गरीब तबके के परिवारो से आते है। इसके माता पिता दिन भर हीरा औा पत्थर खदापनो मे काम करते है बच्चो को कार्य स्थल पर साथ ले जाते है। लगातार सिलिका इस्ट के प्रभाव में रहने के कारण गंभीर रुप से टी बी ; माइक्रो बैक्टीरिया ट्यूब्रक्लोसिस द्ध के भी षिकार हो जाते है । हालत यह है कि जिला मुख्यालय स्थित पोषण पुनर्वास केन्द्र आने वाले बीमार बच्चो मे कई टी बी के षिकार भी होते हैं।
खाली पड़े रहते पोषण पुनर्वास केन्द्र
कुपोषित और गंभीर रुप से कुपोषित बच्चों को पोषण आहार देकर स्वस्थ करने के उद्देष्य से जिला अस्पताल परिवार मे 20 बेड़ पोषण पुनर्वास केन्द्र और सामुदयिक स्वास्थ्य केन्दोें में 10 – 10 बेड़ वाले पोषण पुनर्वास केन्द्र बनाए गए हैं। जिलेभर में संचलित 1492 आंगबाड़ी कार्यकर्ता सहायिका और 44 सेक्टर में काम करने वाले सेक्टर सुपरवाइजरो की ड्यूटी है। कि वे क्षेत्र के कुपोषित और अति कुपोषित बच्चों को चिह्नित कर उन्हें स्वास्थ्य लाभ के लिए समीपी पोषण पुनर्वास केन्द्रों में भर्ती कराए लेकिन मैदानी अमले के जिम्मेदारी नहीं निभाने के कारण जिले के पोषण पुनर्वास केन्द्रों में हमेषा 50 फीसदी से भी अधिक बैड़ खाली पड़े रहते हैं।

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